शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

मेरी भावनाए अपने सबसे प्रिय दोस्त पंकज के लिए !

दोस्त कहूँ या सखा कहूँ ,आखिर तुम ही बोलो तुम्हे क्या कहूँ 
मरुस्थल में हो तुम पानी के जैसे बाढ़ में हो तुम नाव के जैसे
तपती गर्मी में हो छाव के जैसे और ठंडी में सुबह-२ की धुप के जैसे |
जब भी मेरा मन उदास होता है तो तुम प्यारी सी ख़ुशी बन के आते हो
और मेरे मन के सुने अल्बम पे न जाने कितने रंग जमाते हो |
तब मेरे मन में ये विचार आता है की तुम्हे क्या कहूँ
दोस्त कहूँ या सखा कहूँ ,आखिर तुम ही बोलो तुम्हे क्या कहूँ |

तुम हो मेरे उलझन के साथी तुम हो मेरे जीवन के साथी
तुम हो मेरे दुःख के साथी,तुम हो मेरे सुख के साथी |
जब तुम नहीं थे तो जीवन में अँधियारा था
बहुत कुछ होते हुए भी कोई नहीं इतना प्यारा था |
अब जब से तुम आये हो जीवन में एक प्यारी सी ख़ुशी लाये हो 
दिल से दिल का मिलना क्या होता है इसका एहसास कराए हो |
तब मेरे मन में ये विचार आता है की तुम्हे क्या कहूँ 
दोस्त कहूँ या सखा कहूँ ,आखिर तुम ही बोलो तुम्हे क्या कहूँ |

हर शाम को तुमसे फ़ोन पे  दो लफ्जो की बातचीत 
दे जाती है मन को सुकून वो दो लफ्जो की बातचीत |
एक ऐसा सुकून जो औरो से घंटो की बातचीत में नहीं मिलता है 
कभी-२ तो लोगो से मिलके भी नहीं मिलता है 
वो तुमसे एक फ़ोन कॉल पे मिल जाता है  |
तब मेरे मन में ये विचार आता है की तुम्हे क्या कहूँ 
दोस्त कहूँ या सखा कहूँ ,आखिर तुम ही बोलो तुम्हे क्या कहूँ |

वो मानसी-रिया का हस-हस के मिलना 
वो भाभी का हर पल खाने के लिए लड़ना 
दुबे,मयूर ,और तुमाहरे साथ वो तुमाहरे छत पे सोना 
बहुत याद आता है वो तुमाहरे कुत्तो का मेरे पीछे पड़ना |
तब मेरे मन में ये विचार आता है की तुम्हे क्या कहूँ
दोस्त कहूँ या सखा कहूँ ,आखिर तुम ही बोलो तुम्हे क्या कहूँ |
मिलते जुलते रहे हम दोनों इस जीवन में,बस यही दुआ है चन्दन की  
साथ बना रहे हमारा इस जीवन में, बस यही दुआ है चन्दन की |

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