शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

रिश्ते - नातों


कैसे लोग भूल जाते है रिश्ते नातों को  
कुछ पैसों की खातिर अपने चाहने वालों को 
आखिर उद्देश्य क्या है इस धरा पे आने का 
इस बहुमूल्य जीवन को पाने का 
क्या बस यही है की अपने और अपनों के लिए जिए
सब लोक लाज भूल के दूसरों का खून पिए 
क्या यही चाहते थे कृष्ण और राम
क्या इसीलिए दिया था उनहोने हमें इतना ज्ञान |  
 कैसे लोग भूल जाते है रिश्ते नातो को 
 कुछ पैसों की खातिर अपने चाहने वालों को |

इस राम- कृष्ण की धरती पे जाने क्यूँ ऐसा हो रहा है
पिता सब रिश्ते नातों को भूल आनर किलिंग कर रहा है
कहीं दहेज़ कम मिलने के कारण बेटियां जलाई जा रही हैं
तो कहीं विज्ञानं की खोज की वजह से कोख में ही दफनाई जा रही है
क्या इसीलिए कृष्ण गीता का उपदेश दे गए थे 
रामचंद्र आदर्शों का रामायण छोड़ गए थे 
अब तो लाज आती है खुद को हिन्दू कहने में 
शिर झुक जाता है खुद को सभ्य समझने  में 
इससे अच्छा होता की हम आदिवासी होते
कम से कम ऐसा घिनौना अपराध तो ना करते 
कैसे लोग भूल जाते है रिश्ते नातो को 
 कुछ पैसों की खातिर अपने चाहने वालों को |

श्रवण कुमार ने माँ बाप की खातिर अपने सुखो को त्यागा था
सीता माँ ने अपने पति की खातिर १४ वर्ष का वनवास भी काटा था
लछमन और भरत ने मिलकर भाई के रिश्ते की क्या परिभाषा दी थी
यदि  हम ये सब बाते भूल चुके हैं
तो फिर क्यूँ हम मंदिर, मस्जिद के नाम पे लड़ते हैं
बिन कारण के क्यूँ पीला और नारंगी चोला पहनते हैं 
अरे जब उनके आदर्श ही ना रहे तो मंदिर का क्या होगा 
ढोंग और दिखावे से आखिर  क्या होगा |
 कैसे लोग भूल जाते है रिश्ते नातो को 

 कुछ पैसों की खातिर अपने चाहने वालों को |

  
 चन्दन सिंह   
०७.०७.२०११ 

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