गुरुवार, 22 सितंबर 2011

जीवन !!!


जीवन हर पल- हर छड रूप बदलता है
कभी आदमी आसमान पे तो कभी जमीं पे होता है |
हर एक दिन आदमी नए विचारों नए अरमानो के साथ उठता है
थका- हारा सा शाम को फिर घर लौटता है
अगले दिन फिर नयी संभावनाओं के साथ उठता है
अपनी चाहत को पाने की आस में इधर-उधर फिरता है
लेकिन न जाने क्यूँ वो सब पा जाने के बाद भी आदमी अन्दर से शांत नहीं हो पाता है
जिसके लिए ये सब किया था उसे पाके भी घबराता है |
जीवन हर पल- हर छड रूप बदलता है .........................................

कभी वही विचार आदमी को हवा में उड़ाते हैं
तो कभी वही विचार आदमी को जमीं पे गिराते हैं
मुश्किल से मुश्किल चीज को आसान दिखाते हैं
तो कभी आसान चीज को असभव सा प्रतीत कराते हैं |
हमारे विचार ही हमारे भविष्य को निर्धारित करते हैं
हम क्या बनेगे इस बात को प्रतिपादित करते हैं
न जाने फिर क्यूँ हम अपने विचारों में शुद्धता नहीं ला पाते हैं
हर घडी शिकायत या बुराई करते नजर आते हैं |
जीवन हर पल-हर छड रूप बदलता है ...............................................

कभी आदमी किसी के प्यार में अपनों को भी भुला देता है
तो कभी अपनों के पास जाने के लिए उसी प्यार को मिटा देता है
कभी किसी के कहने पे हम अपने को सुरूप मान लेते हैं
तो कभी उसी के कहने पे खुद को कुरूप नजर आते हैं
प्रेमी-प्रेमिका शुरू के दिनों में एक दुसरे पे जान लुटाते हैं
थोड़े दिन बाद मन भर गया तो एक-दुसरे की जान निकालते हैं
जैसा सोचो वैसा है जीवन
सोचो तो सम्भावनाये हैं
सोचो तो विपदाए हैं
जो सोचो वही मिलता है
जो बोवोगे वही उगता है

जीवन हर पल-हर छड रूप बदलता है .................................................................


रविवार, 18 सितंबर 2011

वर्ड कप !!!


क्या जीत आई है इतने दिनों के बाद
जीता हमने वर्ड कप कितने दिनों के बाद
१९८३ के बाद क्या शुभ अवसर आया है
ऐसा लगता है चाद खुद जमी पे उतर आया है
दीपावली,ईद,क्रिश्मस पहली बार साथ में आया है
 सबने मिलकर क्या हर्स मनाया है
क्या होती है जीत ये धोनी सेना ने कर दिखलाई है
आलोचकों के मूह पे क्या चमाट लगाई है
पहले ऑस्ट्रेलया फिर पाकिस्तान अब श्रीलंका को धुल चटाई है ।

गौतम,धोनी,ने मिल कर क्या जीत दिलाई है
सचिन को उठा के कंधो पे रैना ने क्या सैर लगाई है
हमने अपनी संस्कृति की सबको पहचान कराइ है
भगवान करे ऐसे ही खुशियों के पल आते रहे
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,इसाई सब ऐसे ही मिलकर त्यौहार मनाते रहे 
यही दुआ है चन्दन की करे न कोई बैर
क्यूँ लड़ते है हम जाति धर्म पर जब सबका मालिक है एक |

बुधवार, 14 सितंबर 2011

हिंदी !!!


कितनी मधुर 
कितनी सरल
कितनी पावन और विरल 
बोली में प्यार लुटाती भाषा
ऐसी है हमारी हिंदी
और ऐसी है हमारी हिंदी भाषा....

अंग्रेजी और मंडारिन के बाद सबसे ज्यादा बोली जाती है 
उंच-नीच का कोई भेद नहीं सबपे प्यार लुटाती है 
शब्दों में है इतना मीठापन की चीनी भी फीकी हो जाती है 
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सबके मुह से हिंदी बोली जाती है
लेकिन आज के इस नए दौर में न जाने क्यूँ लोग हिंदी बोलने में शरमाते हैं
modern बनने के चक्कर में अंग्रेजी बोलते पाए जाते हैं  |


पूरा बॉलीवुड हिंदी में फिल्मे बनाता है
और उन्ही फिल्मो की वजह से घर का चूल्हा -चौका चलाता है
फिर भी न जाने क्यूँ हिंदी बोलने में शर्माता है  |
हमारे सारे अभिनेता और अभिनेत्री हिंदी की खाते हैं 
लेकिन अंग्रेजी में बतियाते हैं 
क्या पीड़ा है उनकी ये तो वो ही जाने 
हम  तो हैं हिंदी के दीवाने -२
आओ आज हिंदी दिवस पे मिलके कसम खाते हैं 
हिंदी को विश्व भर में फैलाते हैं...........................................

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

सपने !!!



निज जीवन में सपनो का होना बहुत जरूरी है
बिन सपनो के जो जिया उसका जीना तो मजबूरी है |
मन में विश्वास और रगों में साहस भर कर जो चलते हैं
दृढ़ता और लगन से जो अपनी मंजिल का पीछा करते हैं
खुद भगवान भी उन्हें सब देने को गगन छोड़ धरती पे आते हैं
अक्सर हमने देखा है ऐसे ही लोग अपनी मंजिल पाते हैं |
निज जीवन में सपनो का होना बहुत जरूरी है
बिन सपनो के जो जिया उसका जीना तो मजबूरी है |


हो मन में विश्वास और सत्य की राह पे जो चलते हैं
आंधिया,तूफान उन्हें क्या रोकेंगे जो खुद पे भरोसा रखते हैं |
इर्ष्या,कटुता और जलन की भावना जिनके जीवन में है
क्या खाक जियेगे वो जो खुद निज की भावना के भी दुश्मन हैं
निज जीवन में सपनो का होना बहुत जरूरी है
बिन सपनो के जो जिया उसका जीना तो मजबूरी है |

क्या थे वो दिन !!!!!



०१.०५.२०११- Pm ]    
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते
सब मिलजुल के करते थे प्यार की बाते |
जैन धर्मशाला में क्या खूब नजारा था
सबने मिलकर खूब लगाया जैकारा था |
पहुँच के वहां पे सब लोग खुशियाँ मना रहे थे 
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सब मिलके हरे रामा हरे कृष्णा गा रहे थे
कन्हैया ढाबे पे सब दोपहार का खाना खा रहे थे 
३० रुपये में भरपेट की स्कीम का फायदा उठा रहे थे
अरविन्द(पहलवान) रोटी पे रोटी मँगा रहे थे
हर एक रोटी को एक बार में ही मुह का निवाला बना रहे थे |
पूजा और रीता खाने में कमियां ढूंढ रही थी 
चावल और दाल देख के मुह फुला रही थी
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते..................................................................

[०१.०५.२०११ -5PM]
ताजमहल देख के आखों पे विश्वास नहीं हो रहा था 
एक राजा के प्यार को देख के मन हर्षा रहा था |
जलन हो रही थी की हम लोग क्यों नहीं हैं ऐसे 
दहेज़ और आनर किल्लिंग के नाम पे कर देते है खत्म जिन्दगानिया कैसे |
तब  मन में यही चल रहा था आखिर हम क्यूँ है ऐसे
जान से प्यारी बीवी को आखिर हम सताते है कैसे |
ज्ञान और अरविन्द विदेशियों से बात कर रहे थे
ये देख के उनके गुरु पंकज हर्षा रहे थे  
सोनू और आलोक बात करने में शरमा रहे थे 
अपनी इसी गलती के कारन वो दोनों पंकज से डांट खा रहे थे |
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते..................................................


धर्मशाला में अन्ताक्षरी की प्रतयोगिता चल रही थी 
दोनों टीमे एक दुसरे को निचा दिखा रही थी |
तुम अगर साथ देने का वादा करो और कोई मेरे दिल की ये दुआ है ये गाना गा रहे थे
एक दुसरे को हराने के लिए अंतिम अक्षर से गिरा रहे थे  |
क्या ख़ुशी थी क्या उत्साह था 
हर कोई मस्त और बिंदास था |
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते........................

सुबह- सब गोमती बस में बैठ के जन्मस्थली जा रहे थे 
कृष्णा और राधा के भजन गा रहे थे
आरती के समय पहुचने के कारन पंकज थोडा गुस्सा रहे थे 
और सब डरे सहमे से अपनी- सीट पे फुसफुसा रहे थे |
आखिर वो समय ही गया जिसके लिए सब लालायित थे 
जन्मभूमि पहुच के सब ख़ुशी और उत्साहित थे |
देख के प्रभु को सब निहाल हो रहे थे 
हरे रामा हरे कृष्णा चिल्ला रहे थे 
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते...................................


गोकुल  की गलियों में पहुँच के हर कोई मन ही मन खुश हो रहा था 
कृष्णा जी यहाँ कभी खेलते थे ये सोच के मन हर्षित हो रहा था 
एक पुजारी नाम का गाईड सब कहानिया किस्से सुना रहा था 
हर एक गली के बारे में बढ़ा चढ़ा के बता रहा था
लेकिन उसके मन में लोभ और तृष्णा भरी पड़ी थी
१००-२०० मिल जाये इस बात की उसे जल्दी थी |
इसी बीच हम नन्द महल पहुँच गए 
और वहां कंस के कुछ भाई बंधू मिल गए 
जो थे पुजारी के वेश में सबको लुट रहे थे 
जो धर्म के नाम पे ढोंग करा रहे थे 
हर किसी आदमी से १५१ और २७१ का भोग लगवा रहे थे 
और जो नहीं लगा रहे थे उन्हें वो दर्शन भी नहीं करा रहे थे |
जो है सृष्टी बनाने वाले उन्हें वो भोग और पैसे से मनाना चाहते हैं
अब उन पापियों को कौन समझाए की भगवान पैसे नहीं मोहब्बत चाहते हैं |  
भगवान करे उन पापियों का नाश हो जाये 
ऐसी जगह पे बैठ के जो धर्म के नाम पे  झूठ बोलते हैं उनका सर्वनाश हो जाये |
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते....................  

अब मेरा और नीरज का बच्चो से बिछुड़ने का समय रहा था
चाहते हुए जाना पड़ेगा ये सोच के मन घबरा रहा था |
दो दिन में इतना प्यार मिला जो वर्षो में नहीं मिलता है
इतने प्यारे बच्चो से मिल के मेरा मन ये कहता है 
भगवान इनमे हमेशा ऐसे ही प्यार और मोहब्बत के रंग भरते रहना 
दिल तोड़े ये किसी का कभी ये आशीर्वाद देते रहना |
खुशियाँ हो इनके आगन में दुःख का नामोनिशान रहे  
हर कोई पढ़ लिख के आगे बढे बस यही चन्दन का अरमान है 
अब जब Delhi गया हूँ तब मन उन यादो को सोच के परेशान हैं |
ज्ञान,अरविन्द और आनंद की याद सता रही है 
उनकी वो चुलबुली बाते मन को रुला रही है |
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते ......                                                                                                                             सब मिलजुल के करते थे प्यार की बाते