शनिवार, 1 मार्च 2014

तुम

कैसे कहूं तुम बिन अब घर सुना लगता है
वो अपनी कोठरी
वो अपना बैठका सुना लगता है
ना दीपावली के दीपक
न होली के रंग
कुछ भी नहीं भाते हैं
बिन तुम्हारे वो चौखटे और दरवाजे काटने को आते हैं
रसोई भी अब बिन तेरे रास नहीं आती है
रोटिया भी फूलने में सकुचाती हैं
न चिड़ियों का चहचहाना पसंद आता है
न मुर्गे कि बाग
हर तरफ जैसे उदासी है
न कोई हर्ष है न कोई उल्लास
आ जाओ साजन मेरे
साथ में रहेंगे
जो भी हो मुश्किल मिल के सहेंगे
एक बार फिर ख़ुशी ही ख़ुशी होगी
मेरी और तेरी जोड़ी क्या खूब जमेंगी
आओ मिलकर दीपक जलाएंगे
एक बार फिर रंग लगाएंगे ॥ 

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