शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

क्या थे वो दिन !!!!!



०१.०५.२०११- Pm ]    
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते
सब मिलजुल के करते थे प्यार की बाते |
जैन धर्मशाला में क्या खूब नजारा था
सबने मिलकर खूब लगाया जैकारा था |
पहुँच के वहां पे सब लोग खुशियाँ मना रहे थे 
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सब मिलके हरे रामा हरे कृष्णा गा रहे थे
कन्हैया ढाबे पे सब दोपहार का खाना खा रहे थे 
३० रुपये में भरपेट की स्कीम का फायदा उठा रहे थे
अरविन्द(पहलवान) रोटी पे रोटी मँगा रहे थे
हर एक रोटी को एक बार में ही मुह का निवाला बना रहे थे |
पूजा और रीता खाने में कमियां ढूंढ रही थी 
चावल और दाल देख के मुह फुला रही थी
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते..................................................................

[०१.०५.२०११ -5PM]
ताजमहल देख के आखों पे विश्वास नहीं हो रहा था 
एक राजा के प्यार को देख के मन हर्षा रहा था |
जलन हो रही थी की हम लोग क्यों नहीं हैं ऐसे 
दहेज़ और आनर किल्लिंग के नाम पे कर देते है खत्म जिन्दगानिया कैसे |
तब  मन में यही चल रहा था आखिर हम क्यूँ है ऐसे
जान से प्यारी बीवी को आखिर हम सताते है कैसे |
ज्ञान और अरविन्द विदेशियों से बात कर रहे थे
ये देख के उनके गुरु पंकज हर्षा रहे थे  
सोनू और आलोक बात करने में शरमा रहे थे 
अपनी इसी गलती के कारन वो दोनों पंकज से डांट खा रहे थे |
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते..................................................


धर्मशाला में अन्ताक्षरी की प्रतयोगिता चल रही थी 
दोनों टीमे एक दुसरे को निचा दिखा रही थी |
तुम अगर साथ देने का वादा करो और कोई मेरे दिल की ये दुआ है ये गाना गा रहे थे
एक दुसरे को हराने के लिए अंतिम अक्षर से गिरा रहे थे  |
क्या ख़ुशी थी क्या उत्साह था 
हर कोई मस्त और बिंदास था |
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते........................

सुबह- सब गोमती बस में बैठ के जन्मस्थली जा रहे थे 
कृष्णा और राधा के भजन गा रहे थे
आरती के समय पहुचने के कारन पंकज थोडा गुस्सा रहे थे 
और सब डरे सहमे से अपनी- सीट पे फुसफुसा रहे थे |
आखिर वो समय ही गया जिसके लिए सब लालायित थे 
जन्मभूमि पहुच के सब ख़ुशी और उत्साहित थे |
देख के प्रभु को सब निहाल हो रहे थे 
हरे रामा हरे कृष्णा चिल्ला रहे थे 
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते...................................


गोकुल  की गलियों में पहुँच के हर कोई मन ही मन खुश हो रहा था 
कृष्णा जी यहाँ कभी खेलते थे ये सोच के मन हर्षित हो रहा था 
एक पुजारी नाम का गाईड सब कहानिया किस्से सुना रहा था 
हर एक गली के बारे में बढ़ा चढ़ा के बता रहा था
लेकिन उसके मन में लोभ और तृष्णा भरी पड़ी थी
१००-२०० मिल जाये इस बात की उसे जल्दी थी |
इसी बीच हम नन्द महल पहुँच गए 
और वहां कंस के कुछ भाई बंधू मिल गए 
जो थे पुजारी के वेश में सबको लुट रहे थे 
जो धर्म के नाम पे ढोंग करा रहे थे 
हर किसी आदमी से १५१ और २७१ का भोग लगवा रहे थे 
और जो नहीं लगा रहे थे उन्हें वो दर्शन भी नहीं करा रहे थे |
जो है सृष्टी बनाने वाले उन्हें वो भोग और पैसे से मनाना चाहते हैं
अब उन पापियों को कौन समझाए की भगवान पैसे नहीं मोहब्बत चाहते हैं |  
भगवान करे उन पापियों का नाश हो जाये 
ऐसी जगह पे बैठ के जो धर्म के नाम पे  झूठ बोलते हैं उनका सर्वनाश हो जाये |
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते....................  

अब मेरा और नीरज का बच्चो से बिछुड़ने का समय रहा था
चाहते हुए जाना पड़ेगा ये सोच के मन घबरा रहा था |
दो दिन में इतना प्यार मिला जो वर्षो में नहीं मिलता है
इतने प्यारे बच्चो से मिल के मेरा मन ये कहता है 
भगवान इनमे हमेशा ऐसे ही प्यार और मोहब्बत के रंग भरते रहना 
दिल तोड़े ये किसी का कभी ये आशीर्वाद देते रहना |
खुशियाँ हो इनके आगन में दुःख का नामोनिशान रहे  
हर कोई पढ़ लिख के आगे बढे बस यही चन्दन का अरमान है 
अब जब Delhi गया हूँ तब मन उन यादो को सोच के परेशान हैं |
ज्ञान,अरविन्द और आनंद की याद सता रही है 
उनकी वो चुलबुली बाते मन को रुला रही है |
क्या थे वो दिन और क्या थी वो राते ......                                                                                                                             सब मिलजुल के करते थे प्यार की बाते 





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