शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

दीपावली !!!!!



दीपों का त्यौहार दीपावली 
अपनों से मिलने का अवसर है दीपावली
दीपावली दुःख से सुख की तरफ एक कदम है 
बिछुडो से मिलने का संगम है |
दीपावली प्रीत है
दीपावली रीत है
दीपावली बिछुडों का अपनों से मिलने का संगीत है
दीपो का त्यौहार है दीपावली |

त्रेता में रामचंद्र जी रावन को मार अयोध्या वापस आये थे
इस ख़ुशी के अवसर पे लोगों ने दीप जलाये थे 
सत्य विजयी हुआ असत्य पे 
अच्छाई जीती बुराई पे
इसी ख़ुशी में लोग हर्षाये थे |
लेकिन कलयुग में दीपावली के मायने बदल गए हैं
दीपो की जगह बम पठाखे आ गए हैं
अच्छाई पे बुराई की जीत होने लगी है
किसके पास कितना धन है इसकी होड़ लगी है
धन कहाँ से आता है? 
कैसे आता है?
इस बात से किसी का मतलब नहीं है
दीपों का त्यौहार दीपावली 
अपनों से मिलने का अवसर है दीपावली 

लोग इस त्यौहार  के पीछे की मूलभावना भूल  चुके हैं
क्यों मनाते है ? शायद इस उद्देश्य को भूल चुके हैं |
एक बार फिर लोग बम पटाखे छुडायेंगे
प्रदुषण और बढ़ाएंगे
अमीर को देख गरीब ललचायेंगे
और फिर उनके द्वारा छुडाये गए पटाखों से ही हर्ष मनाएंगे
भगवन, कुछ ऐसा करो की लोगों के अन्दर से अहंकार,लोभ और लालच खत्म हो जाये
अमीर और गरीब के बीच की खाई पट जाये 
हर कोई बिना दिखावे के इस त्यौहार को मनाये 
ये त्यौहार क्यूँ मनाते हैं इस भावना को समझ पाए
दीपों का त्यौहार दीपावली 
अपनों से मिलने का अवसर है दीपावली |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें