ये कैसी कहानी है रिश्तो की
जो समझ में नहीं आती है
कभी रुलाती है तो कभी हसाती है
कभी अपने सगे रिश्ते सगे नहीं रह जाते हैं
कभी बेगाने भी सगों से बढ़ के नजर आते हैं
क्या ये पिछले जनम का नाता है
या किसी और वजह से हमें लुभाता है
या कुछ और जो पहले से ही निर्धारित है
ये कैसी कहानी है रिश्तों की
जो समझ में नहीं आती है.........................
जीवन के इतने सालों में मैंने ऐसा कुछ देखा है
अपने ही जीवन में मैंने रिश्तो को बनते और बिगड़ते देखा है
जो भाई बिना दुसरे भाई की सहमति से एक कदम नहीं उठाता था
छोटे भाई को कुछ हो जाये तो बड़ा भाई दुखी हो जाता था
लेकिन समय के साथ रिश्तो का मीठापन भी चला जाता है
वही भाई बाद में उस भाई को सुनी आँख नहीं सुहाता है
ये कैसी कहानी है रिश्तो की
जो समझ में नहीं आती है.....................................
कभी जो अपना था आज वो पराया है
जिससे उम्मीदें ना थी वही आज बना मेरा साया है
न जाने रिस्तो में इतनी विविधिता क्यूँ हैं
पैसो के लिए रिश्तों में इतनी अस्थिरता क्यूँ हैं
सबको मालूम है की एक दिन सब यही छोड़ जाना है
चल हो या अचल सब यही रह जाना है
फिर क्यूँ हम अपनों को भूल जाते हैं
और रिश्तों को क्यूँ नहीं निभाते हैं
ये कैसी कहानी है रिश्तों की
जो समझ में नहीं आती है......................................................

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