शनिवार, 1 मार्च 2014

वो

वो जब लड़ती है तो कहती है
कि तुम कितने  बदल से गए हो
रंग रूप में तो निखरे हो
लेकिन प्यार करना भूल से गए हो
पहले बेख़ौफ़ चलती थी तुम्हारे साथ
अब संभल संभल कर कदम रखती हूँ
कि कहीं  बहक न जाऊँ
कहीं खो ना जाऊँ
कहीं तुम्हारी दुनिया से दूर ना हो जाऊँ
ये मेरा डर है
ये मेरी फिकर है
ये मेरा प्यार है
जो मुझे शंकालु बना देता है
जो मुझे लड़ने पे मजबूर कर देता है
जब मुझे ignore करते हो
तो ऐसा लगता है
जैसे जीवन में अब कुछ बाकी ही नहीं है
हर तरफ निराशा ही निराशा है
तब मै कहता हूँ
कभी खुद को मेरी नजरो से देखो
कितना प्यार करता हूँ
कितने करीब हो
शायद इसका एहसास होगा तुम्हे ॥ 

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