शनिवार, 1 मार्च 2014

बूंदाबादी

आज रास्ते  में बूंदाबादी मिली
ऐसा लगा जैसे हर एक बूँद
अपने साथ तुम्हारा संदेसा लायी हो
कुछ कहने आयी हो
कुछ सुनने आयी हो
एक प्यारी सी धुन थी
प्यार था एहसास था
लेकिन न जाने  क्यूँ चुपचाप और उदास थी
उसकी हंसी उसकी खिलखिलाहट गायब थी
मैंने पूछा क्या हुआ ?
क्यूँ इतनी उदास हो ?
मुझे भी बताओ
हाले दिल तो सुनाओ
गहरी साँसे लेती हुए बोली
तुमसे खफा हूँ
तुमसे नाराज हूँ
मैंने पूछा कारन तो बताओ
तो बोली
मुझे न जाने  क्यूँ ऐसा लगता है
कि तुम अब बदल से गए हो
अब तुम वो चन्दन नहीं हो
जो  मुझमे डूब जाते थे
मुझमे समां जाते थे
अब न तो वो प्यार है
न वो बेकरारी है
जो पहले हुआ करती थी
पहले मै  सो जाती थी
तुम जागते थे
देर रात तक बाते किया करते थे
दिन में भी लड़ प्यार दिखाते थे
मुझे मनाते थे
लेकिन अब तुम सो जाते हो
मै  धीरे से मुस्काया
और अपने पास बुला के गले से लगाया
कि सुनो मेरी दिल कि धड़कने
हर धड़कन में तुम्ही हो
बस तुम और तुम  ही हो
ये बाते मन से निकालो
मै  और तुम को छोड़ हम  हो जाओ ॥ 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें