शुक्रवार, 7 मार्च 2014

पल

अगला पल क्या होगा
मालूम नहीं
हम तुम होंगे
ये जीवन होगा
नभ
सृष्टि   
ये दुनिया 
ये तारे चाँद सितारे होंगे 
मालूम नहीं
देश होंगे 
प्रदेश होंगे 
सीमायें होंगी 
युद्ध होंगे 
मालूम नहीं ॥ 

जब ये सब होगा ही नहीं
तो क्यूँ मन में इतनी अभिलाषा है 
क्यूँ सब कुछ अपना बनाने कि आशा है 
क्यूँ आदमी इतना परेशान है?
क्यूँ आज इंसान इंसान नहीं है ? 
क्यूँ आदमियों में राम नहीं हैं 
नारियों में सीता नहीं है 
क्यूँ हर तरफ कोहराम ही कोहराम है
ये सोचने कि बात है 
अगला पल क्या होगा मालूम नहीं ॥ 






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