शनिवार, 10 मई 2014

माँ !!

माँ आखिर कितना  दुख सहती है
जब भी सोचता हूँ  आँख भर आती है
पालती , पोसती और दुलारती है
ये मा नही कोइ दैवी है
जो इतने दुख हरती  है ॥

याद करिये वो बचपन के दिन
जब हम चलते -चलते गिर जाते थे
जो भी देखा वही खाने की जिद करते थे
तब वो मा ही थी
जो हमे उठाती थी
हर जिद को बड़े प्यार से निभाती थी
लेकिन अब जमाना बदल सा गया है
जो माँ लाइट न होने पे पूरी रात पंखा हिलाती थीं
वो जीवन कि सान्ध्य बेला मे उन्ही बच्चोँ से दुख पाती है
सोचता हूँ जब भी आँख भर आती है
ये मा ही है जो इतना दुख सहती है ॥

कर्तव्यो से विमुख हो जाना
कलयुगी बच्चो की पहचान है
खाएं-पिये यही उनका अरमान है
शायद वो बेटे भूल गये है
की वो भी बूढ़े होँगे
उनके सपूत भी कपूत बनेगे
तब शायद आँख खुलेगी
बाकी जिंदगी पछतावे मे कटेगी
सोचता हूँ जब भी आँख भर आती है
ये मा ही है जो इतना दुख सहती है ॥ 

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